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Santhal Paragana · The Unheard History of the Hills

सन्थाल परगना:
पहाड़ियों का अनसुना इतिहास

Pahadiyon Ka Ansuna Itihas

"जब जंगल बोलते हैं, तो पहाड़ सुनते हैं — और वे सब याद रखते हैं।"
The landmark history of Santhal Paragana, now available in Hindi for the first time.

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Santhal Paragana Hindi Edition Book Cover
Language हिंदी
Format Paperback
Pages 300+
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"पहाड़ बोलते नहीं, पर सब कुछ याद रखते हैं।"
— पुस्तक के पहले अध्याय से
आदिवासी विरासत स्मृति और पहचान प्रकृति और भूमि इतिहास

सन्थाल परगना: पहाड़ियों का अनसुना इतिहास — यह पुस्तक झारखंड के पूर्वी कोने में बसे उस अद्भुत क्षेत्र की महागाथा है, जहाँ धरती स्वयं एक जीवंत इतिहास है।

करोड़ों वर्षों के कालखंड को समेटती यह कृति — जुरासिक लावा प्रवाह से लेकर राजमहल पहाड़ियों के प्राचीन असुर लौहकर्मियों तक, और उन वीर पहाड़िया योद्धाओं तक, जिन्होंने मुग़ल और ब्रिटिश साम्राज्यों को अपनी चोटियों से दूर रखा — यह सब एक सूत्र में पिरोती है।

इस पुस्तक के केंद्र में है सन्थाल लोगों का महाकाव्यात्मक संघर्ष: दामिन-ए-कोह में उनका ऐतिहासिक प्रवास, बाघ-भरे जंगलों को सोने के खेतों में बदलना, और 1855 के सन्थाल हूल की वह ज्वाला जो उपनिवेशी शोषण के खिलाफ भड़की। मुर्मू बंधुओं के नेतृत्व में पचास हजार के विद्रोह की अमर गाथा।

यह केवल युद्धों और ब्रिटिश अधिकारियों का इतिहास नहीं — यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा की गहन खोज है। जाहेर थान के पवित्र वन से लेकर ओल चिकी लिपि के आविष्कार तक — यह कहानी है उन आदिवासी समुदायों की, जिन्होंने अपनी पहचान, अपनी भूमि और अपनी स्मृति की रक्षा की।

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अपनी भाषा में इतिहास

सन्थाल परगना की यह अनूठी कहानी अब हिंदी पाठकों के लिए उनकी अपनी भाषा में — ताकि इतिहास और संस्कृति की यह धरोहर सबकी पहुँच में हो।

🌿

मूल भाव सुरक्षित

अनुवाद में मूल अंग्रेज़ी संस्करण की आत्मा को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है — शोध की गहराई, कहानी की रवानगी, और क्षेत्र के प्रति श्रद्धा।

🏔️

व्यापक पहुँच

हिंदी भारत की सबसे व्यापक भाषा है। इस संस्करण से झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और पूरे उत्तर भारत के पाठक इस महत्वपूर्ण इतिहास से जुड़ सकेंगे।

★★★★★

"अंग्रेज़ी संस्करण पढ़कर मन उठा था — हिंदी में भी यही गहराई और ऊर्जा है। सन्थाल परगना के इतिहास को इतने आत्मीय तरीके से प्रस्तुत करना अद्भुत है।"

— पाठक, रांची, झारखंड
★★★★★

"भारत के आदिवासी इतिहास पर इतनी शोधपरक और पठनीय पुस्तक हिंदी में दुर्लभ है। प्रियांशु गुप्ता ने अद्वितीय कार्य किया है।"

— इतिहासकार, पटना
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